खयालो के खामोश लम्हों में ,यह मनं तेरी ही बातें करता है !!
में चाहे भूल भी जाऊ यह मनं फिर भी यादों के ताने बुनता रहता है !!
यह यादों के सिलसिले ख़तम क्यों नहीं हो जाते !!
यह यादों के सिलसिले ख़तम क्यों नहीं हो जाते !!
मेरे कानो में गूंजती तेरी सिसकिय ,
रात के अँधेरे में दफ़न क्यों नहीं हो जाते !!
इस दर्द की आच बड़ते जा रही है !!
मुजह से मुजहे , दूर ले जा रही है !!
मुजह से में भी खो गया ...... , और तुज्ह तक भी नहीं पौह्चा
क्या है यह सिलसिला जो कही रास्ते में ही थम गया
क्या है यह अधुरा सा मेरे अन्दर जो आज भी तुज्ह से जुड़ता है !!
क्यों मिलो दूर हो कर भी , कभी कभी मुजह में तू दिखता है !!
@SIDH :With all due respect to you and your work . This is my version....