Sunday, February 23, 2014

Khayal #3




कभी तू सुकून देती रौशनी सा है
कभी मेरे होटों पर मुस्कुराती ख्वाइशों सा है

कभी मेरे सपनो कि उड़ान सा है
कभी मेरे दुआओं कि शाम सा है

सुन्हेरी धूप में खिलते मेरे एक ख्वाब का हिस्सा है तू
गुलाबी ठन्ड कि एक सुबह का किस्सा है तू


न चाहतो के दायरो सा , ना मोहब्बतो के सिलसिलो सा
फिर भी कही से कुछ कुछ.………… मुझसा  है तू

……… 

Monika 

Sunday, February 2, 2014

Train Diaries #1

 

दौड़ती  भागती इस भीड में हर अक्स अपने  जैसा है 

बाहरी बनावट बेशक अलह हो , भीतरी आकार इक जैसा है 

 

मन में उमड़ती भावनाए इक जैसी  है 

आँखों से बेहते आसू भी इक  जैसे है 

 

उमीदे भी और सपने भी इक से है 

यादो की  तंग गलियों  से गुजरते , ख्याल भी इक  जैसे है 

 

अपने  मन की कहने का मौका तलाशते  है 

सुनने के लिए इक  दोस्त का साथ चाहते है 

 

जो हर कोई हम जैसा है , तो क्यों न किसी  अनजान चेहरे  कि बातें  सुने 

किसी का कुछ पल के लिए साथ निभाये 

 

शायद किसी  रोज़ वोह दुबारा मिले 

अपने  मन कि कहे , और मेरे मन कि सुने 




 This poem is based on one of my conversation with a fellow commuter, I don't know her name but she completely poured her heart out. I felt as if she just wanted some one ,who could listen to her. While Bidding goodbye, she said "Felts so great talking to you , hope we meet again". I gave her my card and said "call me if you feel like talking" .......

Sometimes you just need that one person , who could simply sit and listen to you without being judgmental.
............Monika