Wednesday, June 19, 2013

Khamoshiya ........

तेरी यह ख़ामोशीया  मुझे  उलझाने लगी है.
दूर रह कर भी तुझे  मुझ  तक लाने लगी  है.

मुझ  से कुछ अल्फाज़ उधार लेले .
आपनी  खामोशियों को , मेरी जुबान देदे .

शायद तू भी सुन  पाए, वोह जो मैंने सुना  है .
तेरे मन का इक तार जो आज भी गुनगुना है .

उसका हाथ थामे कभी दो कदम चल के तो देख .
अपनी  खामोशियों के खली पन्हों  को ,पलट के तो देख .

इक  मुस्कराहट आज भी तेरे इंतज़ार में खामोश खडी  है .
अपने  खयालो में तेरे साए साथ ले कर चली है .


आगे अब  साथ ....तुज्हे ही निभाना होगा .
अपने  लवजो से ..... इस ख़ामोशी के खालीपन को .....तुझे ही मिटाना होगा . 
 


....... Monika :)











 

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